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विशेष सत्र से पहले सीएम हेमंत पर आ सकता है राज्यपाल का फैसला, ऐसा हुआ तो संवैधानिक संकट की ओर झारखंड !

झारखंड की सियासत में चल रही रस्साकस्सी के बीच नित नए नए दृश्य देखने को मिल रहे हैं. सरकार और राजभवन के बीच चल रही नूराकुश्ती अगले 48 घंटे में कोई नया दृश्य उत्पन्न कर दे इससे इनकार नहीं किया जा सकता है. हेमंत सरकार ने 5 सितंबर को विधानसभा की एकदिवसीय सत्र बुलाई है. यह भी उनकी एक रणनीति का हिस्सा है. इस बीच आज राज्यपाल दिल्ली गए हैं. हालांकि यह कहा जा रहा है कि वह अपने पारिवारिक कार्यों से दिल्ली गए हैं लेकिन राजनीतिक गलियारे में इस तरह के चर्चाओं का बाजार गर्म है. पुख्ता सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार हेमंत सरकार द्वारा बुलाये गए एक दिवसीय विधानसभा सत्र से पहले आफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में हेमंत सोरेन पर राज्यपाल का फैसला आ सकता है. यानी राज्य की राजनीति के लिए अगला 48 घंटे काफी महत्वपूर्ण है. यदि हेमंत सोरेन के खिलाफ राज्यपाल का फैसला आता है तो राज्य में संवैधानिक संकट उत्पन्न हो सकता है. राजनीतिक गलियारे में यह सवाल उठ रहा है कि यदि हेमंत सोरेन की सदस्यता चली जाती है तो क्या 5 सितंबर को आहूत सत्र होगा या नहीं. संसदीय विषयों के जानकार अयोध्या नाथ मिश्र का कहना है कि जो सत्र आहूत है वह तो होगा ही. क्योंकि कैबिनेट से सहमति के बाद ही स्पीकर द्वारा सत्र के लिए समन जारी किया जाता है. जब एक बार समन जारी हो जाएगा तो सत्र आहूत होगा. अब सवाल उठता है कि सत्र का विषय क्या है. इसपर सदन में स्पीकर अपना व्यक्तव्य देंगे. यह पूछे जाने पर की जब सदन नेता की विधानसभा की सदस्यता नहीं रहती है ऐसी स्थिति में सत्र का क्या मतलब. उन्होनें कहा कि सत्र बुलाने की अनुमति राज्यपाल से राज्य सरकार लेती है. यह जो सत्र है वह मॉनसून सत्र की विस्तारित अवधि है. इसपर राज्यपाल से अनुमति की आवश्यकता नहीं है. सरकार कैबिनेट के निर्णय से विधानसभा अध्यक्ष को अवगत कराएंगे और स्पीकर सत्र में किस विषय पर चर्चा होगी इसको लेकर सम्मन जारी करेंगे. इस बीच यदि कुछ होता है तो उसपर फैसला सदन के अंदर ही होना है. सत्र तो होगा ही.

मुझे लगता है संवैधानिक संकट की तरफ जा रहा है झारखंड : नामधारी

झारखंड विधानसभा के पहले अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी का कहना है कि जो दृश्य झारखंड में दिख रहे हैं वह संवैधानिक संकट की ओर जाने का इशारा कर रहा है. कहा कि राज्यपाल का क्या फैसला आता है यह तो हेतु हेतु मद भूत में है लेकिन जो राजनीतिक दृश्य दिख रहे हैं वह देश मे संवैधानिक इतिहास में एक नजीर पेश करेगा ऐसा मुझे प्रतीत हो रहा है. उन्होनें कहा कि एक बार जो सत्र आहूत हो गया है और स्पीकर द्वारा समन जारी हो जाने के बाद उसे स्थगित करने का अधिकार स्पीकर को ही है वह भी वे सदन के अंदर ही कर सकते हैं. ऐसे में सत्र तो आहूत होगी लेकिन जैसा कि आपने सवाल किया कि जब सदन नेता की ही सदस्यता चली जायेगी तब क्या होगा, यह एक जटिल प्रश्न है. क्योंकि यदि जो मामले राज्यपाल के पास हैं उसमें यह मान भी लें, कि मुख्यमंत्री की सदस्यता ही सिर्फ जाती है तब भी उनको छह महीने के भीतर चुनाव जीतकर आना होगा. लेकिन इस बीच सदस्यता जाते ही उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ लेनी होगी. सत्र से पहले यदि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस्तीफा देकर फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हैं तो ठीक है लेकिन ऐसा नहीं होता है, तो बिना नेता सदन के सत्र का कोई औचित्य नहीं है

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